क्या विकास के नाम पर चुनाव जीतना पक्का

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 Saved by user, Anonymous on January 05, 2017; 01:57 PM
उत्तरप्रदेश जैसे विशाल सूबे में क्या विकास पर चुनाव लड़ने से जीत पक्की हो जाएगी. ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हर पार्टी विकास को ही अहम मुद्दा बनाकर मैदान में उतरी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आने वाले दिनों जिन पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, उनमें से एक उत्तर प्रदेश भी है. उन्होने कहा कि जहां तक भाजपा की बात है, हम सिर्फ विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे. इसमें मुख्य जोर किसानों के कल्याण, गांवों, युवाओं के लिए रोजगार पर होगा और हम सामाजिक न्याय को लेकर प्रतिबद्ध रहेंगे. प्रधानमंत्री ने ये भी कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में वोट-बैंक की राजनीति जैसा कोई माहौल नहीं था, उस समय विकास की राजनीति का माहौल था. वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कहा कि समाजवादी पार्टी 2017 का विधानसभा चुनाव युवाओं को साथ लेकर विकास के आधार पर लड़ेगी. भाजपा और बसपा जैसे विरोधी दल भी सपा सरकार के विकास कार्यों को देखकर विकास की ही बात कर रहे हैं. परंतु एक पार्टी का विकास केंद्र में दिख रहा है तो दूसरी के हाथी अभी तक बैठे हुए हैं. तभी शायद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हर रोज जनता पर सौगातों की बोछार कर रहे हैं. मुख्यमंत्री बनने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती को भाजपा और सपा का मुकाबला करना है. तो मायावती ने भी विकास का हाथ थाम लिया है. बसपा के कार्यकर्ता सपा और भाजपा सरकार की जनविरोधी नीतियों और बढ़ती महंगाई के बारे में बताते हुए मायावती को फिर से सत्ता में लाने की अपील कर रहे हैं. इस बार बसपा मूर्तियों और स्मारकों से दूर रहते हुए विकास और कानून व्यवस्था को तरजीह देने की बातें कह रही हैं. विकास बीते विधानसभा चुनावों में पार्टियों के लिए फायदेमंद साबित हुए थे. बिहार की बात करें तो साल 1989 से 2005 तक लालू प्रसाद यादव कभी खुद तो कभी अपनी पत्नी रावरी देवी के माध्यम से बिहार पर राज करते रहे. इस दौरान सिवाय दलितों पिछड़ों को सामाजिक न्याय या आवाज देने के उन्होंने कोई ठोस आधार भूत काम बिहार में नहीं किया. लेकिन फिर भी लालू यादव लगातार 15 साल तक बिहार की सत्ता पर काबिज रहे. और आज फिर लोगों को सामाजिक न्याय के साथ विकास का वादा करके सत्ता में लौटे और वहां नीतीश के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं. शीला दीक्षित पिछले 15 साल से दिल्ली की मुख्यमंत्री थी. और उनके शासन काल में ही दिल्ली में मैट्रो समेत कई अन्य विकास कार्य किए. या यू कहें कि आज हमें जो कुछ चमक धमक दिल्ली में दिखाई देती है वो सब शीला दीक्षित की देन है. लेकिन जब दोबारा शीला दीक्षित चुनाव में उतरी तो कांग्रेस पार्टी तो चुनाव हारी ही शीला दीक्षित अपनी खुद की सीट भी हार गई, और आम आदमी पार्टी की सरकार बन गई. इन सब उदाहरणों के बाद ये कहना की विकास के नाम पर चुनाव लड़ने से जीत आसान हो जाती है गलत होगा. क्योंकि इन सब उदाहरणों के बाद इसमें कोई सच्चाई दिखाई नहीं दे रही है. बाकी विकास का मुद्दा कितना रंग लगाएगा ये तो आगामी विधानसभा चुनाव के नतीजे ही बताएंगे.

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